Wednesday, September 06, 2006

रामगोपाल दीक्षित
इस क्रान्ति दिवस ( ९ अगस्त ) पर १९७४ में 'क्रान्ति का बिगुल' बजाने वाले कवि और वरिष्ट गांधीवादी रामगोपाल दीक्षित की ८९ वर्ष की अवस्था में म्रुत्यु हो गयी .सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के दौर में लाखों की जन - मेदिनी को लोकनायक जयप्रकाश सम्बोधित करते थे.इन सभाओं की शुरुआत दीक्षितजी के क्रान्ति गीत से ही हो यह उनकी फ़रमाइश होती थी . आपातकाल के 'दु:शासन पर्व ' में 'तिलक लगाने तुम्हे जवानों , क्रान्ति द्वार पर आई है ' के रचयिता दीक्षितजी की उत्तर प्रदेश पुलिस को तलाश थी.लोक शैली में आल्हा सुनाने तथा कथा - वाचन में निपुणता के कारण दीक्षितजी तरुण शान्ति सेना के शिबिरों के लोकप्रिय प्रशिक्षक थे .
सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयता ( राष्ट्रतोडक राष्ट्रवाद नहीं ), अनुशासन और दायित्व के बोध व निर्वाह के गुणों के कारण वे शान्ति सेना के 'तत्पर शान्ति सैनिक ' थे . सर्वोदय और सम्पूर्ण क्रान्ति से प्रेरित उनके गीत आन्दोलन को शक्ति देते थे और तरुणों के चित्त में त्वरा का संचार कर देते थे . बुन्देलख्ण्ड का होने की वजह से बागियों के आत्मसमर्पण के बाद बने चम्बल शान्ति मिशन से भी वे जुडे थे . तत्काल गीत रच देने और स्वर दे देने मे उन्हें प्रवीणता हासिल थी.
तरुण शान्ति सेना के शिबिरों में दीक्षितजी की कथा और गीतों के अलावा उनके द्वारा कराये जाने वाले खेलों का ज़िक्र भी जरूरी है . यह सभी खेल बिना किसी खर्च के खेले जाते थे तथा मनोविनोद के साथ साथ शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को तराशने वाले होते थे .क़रीब दो वर्ष पहले पांव मे लगी चोट के कारण उन्हें कानपुर में भर्ती कराया गया था . चिकित्सकों का कहना था कि कम से कम छ: महीने उन्हें आराम करना चाहिये . दीक्षितजी ने कहा के वे आश्रित हो कर रहने के आदि नही नही रहे हैं और इसलिये वे हमीरपुर जिले के अपने पैत्रूक गांव मुसकर चले आए और प्रतिदिन दो -तीन किलोमीटर तक पैदल चलना भी शुरु कर दिया.
मुलायमसिंह यादव की सरकार ने ' लोकतंत्र सेनानियों ' को सम्मानित करने का फ़ैसला लिया है . 'लोकतंत्र सेनानियों ' के सबसे बडे सेनापति लोकनायक जयप्रकाश नारायण के निकट सहयोगी और उनके विचारों को अपने गीतों द्वारा तरुणों के ह्रुदय में अंकित कर देने वाले दीक्षितजी की सुध किसी सरकार को नहीं रही और न ही वे सरकारी सुध के मुखापेक्षी थे यद्यपि अन्तिम दौर में आर्थिक कठिनाइयों का सामना उन्हे करना पडा .अहिन्सक संघर्ष की तालीम मे रामगोपाल दीक्षितजी का योगदान स्थाई है.
अफ़लातून , अध्यक्ष, समाजवादी जनपरिषद (उ.प्र.)
क्रान्ति गीत
जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है, तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है.
आज चलेगा कौन देश से भ्रष्टाचार मिटने को , बर्बरता से लोहा लेने,सत्ता से टकराने को.
आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है. (तिलक लगाने..)
पर्वत की दीवार कभी क्या रोक सकी तूफ़ानों को,क्या बन्दूकें रोक सकेंगी बढते हुए जवानों को?
चूर - चूर हो गयी शक्ति वह , जो हमसे टकराई है .(तिलक लगाने.. )
लाख़ लाख़ झोपडियों मे तो छाई हुई उदासी है,सत्ता - सम्पत्ति के बंगलों में हंसती पूरणमासी है.
यह सब अब ना चलने देंगे,हमने कसमें खाई हैं . (तिलक लगाने..)
सावधान, पद या पैसे से होना है गुमराह नही,सीने पर गोली खा कर भी निकले मुख से आह नही.
ऐसे वीर शहीदों ने ही देश की लाज बचाई है . ( तिलक लगाने..)
आओ क्रुषक , श्रमिक , नगरिकों , इंकलाब का नारा दो-
कविजन ,शिक्षक , बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो.
फ़िर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है,तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है..
- रामगोपाल दीक्षित--

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